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नवीकरणीय ऊर्जा, जल सुरक्षा, जैव विविधता और पर्यावरण के अनुकूल पद्धति को बढ़ावा देने, संरक्षित करने और/या बढ़ाने के उद्देश्य से परियोजनाओं और कार्यक्रमों के माध्यम से पर्यावरण को स्वस्थ बनाना.
जलाधर
यह कार्यक्रम जल संकटग्रस्त क्षेत्रों में जल सुरक्षा प्राप्त करने का लक्ष्य रखता है, जिसे तीन विभिन्न मॉडलों के माध्यम से किया जाता है: समग्र जलाधार प्रबंधन (IWD), जलाशय पुनर्जीवन (WR) और जल उपलब्धता (WA). ये मॉडल अलग-अलग और साथ मिलकर वर्षा या जल अपवाह को इकट्ठा करते हैं, ताकि भूमिगत जल में जल का प्रवाह बढ़ सके, कृषि में पानी के विवेकपूर्ण उपयोग को प्रोत्साहित किया जा सके और आय सृजन गतिविधियों के जरिए समुदाय की आय बढ़ाई जा सके. यह कार्यक्रम यूनाइटेड नेशन्स के सतत विकास लक्ष्य 6 के अनुरूप है, जो भूमिगत जल पुनर्भरण और जल तक पहुंच प्रदान करता है. अब तक 3 राज्यों में इस प्रोजेक्ट का कुल प्रभाव इस प्रकार रहा है:
330+
महाराष्ट्र, राजस्थान और तमिलनाडु में कवर किए गए गांव
790+
जलाशय बनाए गए/ सुधार किए गए
45,000
लाख लीटर की वार्षिक जल संचयन क्षमता बनाई गई है
5.4 लाख+
लाभ उठाने वाले व्यक्ति
3,000
एकड़ भूमि पर माइक्रो-इरिगेशन किया गया
5.5
मीटर - भूजल स्तर में औसत वृद्धि
₹30,000
फसल विविधता और सिंचाई के कारण आय में औसत वृद्धि
ग्रीन स्विच
लगभग 0.5% घरों में अभी भी बिजली नहीं होने के बावजूद, द ग्रीन स्विच प्रोजेक्ट टाटा कैपिटल का प्रयास है, जो भारत के आकांक्षी जिलों में अंधेरे में जीवन यापन कर रहे समुदायों को रोशन करने के लिए किया जा रहा है. टाटा कैपिटल को हमारे ग्रीन स्विच प्रोजेक्ट के लिए FICCI CSR अवॉर्ड 2023–24 में विजेता के रूप में मान्यता दी गई, यह पुरस्कार ”आकांक्षी जिला – उन निजी क्षेत्र की कंपनियों के लिए जिनका वार्षिक टर्नओवर 3001 करोड़ रुपये से अधिक है” श्रेणी में दिया गया
ऊर्जा सुरक्षा परियोजना डिजाइन करने की इच्छा देश भर में क्लीनटेक प्रोजेक्ट्स के लिए फंडिंग जुटाने के लिए उत्पन्न हुई. हमारा मानना था कि अंधेरे में रहने वाले समुदायों को देश के समग्र विकास में शामिल करना ज़रूरी है और इसके लिए बिजली तक उनकी पहुंच बेहद महत्वपूर्ण है. इस प्रकार, एक सतत रणनीति तैयार की गई, ताकि उन समुदायों को 24X7 नवीनीकृत ऊर्जा प्रदान की जा सके जो घरेलू बिजली के लिए पूरी तरह केरोसीन/लकड़ी पर निर्भर हैं. इस रणनीति ने समावेशिता को बढ़ावा दिया और इसे समुदाय के स्वामित्व मॉडल के माध्यम से संचालित किया गया.
द ग्रीन स्विच प्रोजेक्ट का मॉडल एक विकेंद्रीकृत ऑफ-ग्रिड सोलर मॉडल पर आधारित है, जिसमें सोलर पैनलों को एक कंट्रोल रूम से जोड़ा जाता है, जहां इन्वर्टर, बैटरियां, आकाशीय बिजली अवरोधक आदि सहित पूरा सेट-अप स्थापित होता है. कंट्रोल रूम के माध्यम से ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन लाइन हर उस घर को बिजली उपलब्ध कराती है, जहां बिजली मीटर, चार्जिंग सॉकेट और 4 LED बल्ब लगे होते हैं. इसके अलावा यह स्ट्रीटलाइट और सामुदायिक भवनों को भी जोड़ती है. इस प्रयास का मुख्य उद्देश्य घरों को पहली बार बिजली प्रदान करना है और इसके माध्यम से सुविधा, आराम और व्यावसायिक अवसरों को सुलभ बनाना है. यह प्रोजेक्ट यूनाइटेड नेशन्स के सतत विकास लक्ष्य 7 और भारत सरकार की 'पावर फॉर ऑल' योजना से प्रेरित है.
अब तक 3 राज्यों में इस प्रोजेक्ट का कुल प्रभाव इस प्रकार है:
1.19
MWp कुल सोलर क्षमता स्थापित की गई
99
गांवों को बिजली प्रदान की गई, महाराष्ट्र, झारखंड और उत्तर प्रदेश में
4,800+
घरों में पहली बार बिजली आई
20,700+
प्रभावित जीवन
₹40,000
उद्यमियों के लिए वार्षिक आय में औसत वृद्धि
155+
स्थानीय ग्रिड ऑपरेटर प्रशिक्षित
290+
किसानों द्वारा खरीदे गए सौर पंप
VN or वन (Vanaropan for Neutrality)
भारत दुनिया का तीसरा सबसे प्रदूषित देश है और बड़े शहरों में पेड़-पौधों और प्राकृतिक क्षेत्रों की कमी के कारण तापमान ज्यादा बढ़ता है, जिसे अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव कहते हैं. राष्ट्रीय वन नीति (1988) के अनुसार, कुल भूमि का 33% वन से ढका होने का लक्ष्य रखा गया है, लेकिन नवीनतम ISFR 2023 के अनुसार भारत का वन आवरण केवल 21.71% है. प्राकृतिक आपदाओं, बाढ़ और सूखे से संबंधित घटनाओं में वृद्धि और तटीय पारिस्थितिकी तंत्रों के नुकसान, वन और पारिस्थितिकी तंत्र के रखरखाव में तुरंत ध्यान देने की आवश्यकता है.
देशभर में व्यापक उपस्थिति के साथ, टाटा कैपिटल ने VN कार्यक्रम की परिकल्पना प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों को सशक्त बनाने, उनकी सुरक्षा और संरक्षण के उद्देश्य से की है. यह कार्यक्रम हरित क्षेत्र बढ़ाने, हवा की गुणवत्ता को सुधारने, जैव विविधता के पुनर्जनन, मिट्टी की संरचना को मजबूत करने, समुदायों के लिए प्रभावी शमन एवं अनुकूलन रणनीतियां विकसित करने तथा कार्बन अवशोषण बढ़ाने पर केंद्रित है. यह पहल निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए इकोसिस्टम के पुनर्स्थापन और संरक्षण हेतु एक दीर्घकालिक रणनीति को बढ़ावा देती है. इस कार्यक्रम के तहत ठाणे, दिल्ली और हैदराबाद में तीन मियावाकी वन स्थल सफलतापूर्वक विकसित किए गए हैं. तीन साइटों पर हमारा समग्र प्रभाव:
SDG 15 और भारत के कार्बन सिंक लक्ष्यों के साथ अनुरूपता
कुल वृक्षारोपण: मियावाकी विधि का उपयोग करते हुए ठाणे, दिल्ली और हैदराबाद में 6.5 एकड़ क्षेत्र में 77,000 देशी पौधे लगाए गए
पर्यावरणीय प्रभाव: पूर्ण रूप से विकसित होने पर लगभग 1630 टन से अधिक कार्बन को अवशोषित करने की संभावना है
जैवविविधता का प्रभाव:
ठाणे स्मार्ट सिटी पहल के अंतर्गत तटीय सड़क हरितीकरण (कोस्टल रोड ग्रीनिंग), ठाणे – 45 से अधिक देशी प्रजातियों के 38,000 पौधे लगाए गए. इस हिस्से को नागरिकों के लिए पुनर्जीवन क्षेत्र के तौर पर विकसित किया जा रहा है.
नई दिल्ली के वज़ीरपुर क्षेत्र में औद्योगिक मलबा भूमि के पुनर्जीवन हेतु 40 से अधिक देशी प्रजातियों के 16,000 पौधों का रोपण किया गया. यह जगह अब औद्योगिक क्षेत्र के बीच बच्चों का बगीचा और हरा-भरा क्षेत्र बन चुकी है.
हैदराबाद में रॉक गार्डन केंद्र का निर्माण किया गया, जिसमें 40 से अधिक देशी प्रजातियों के 23,000 पौधे लगाए गए
तीनों साइटों में ~95% सर्वाइवल दर है
77,000+
देशी पौधे
6.5
एकड़ भूमि पर वृक्षारोपण किया गया
1630
टन कार्बन को प्राकृतिक तरीके से वातावरण से हटाया गया
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